Tuesday, December 4, 2007

रोक लेती ज़िंदगी तो मैं लौट आता

बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तु , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझसे दूर कभी न जाता

ज़िंदगी माना, मैंने तुझसे वफ़ा कभी न की
शायद इसलिए हम दोनों आज भी है अजनबी
काश के मैं तुझ से कभी वफ़ा कर पाता
तो ज़िंदगी मैं तुझको आज अपना कह पता
बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तू , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझसे दूर कभी न जाता

ज़िंदगी क्या है, मैं यह समझ ही न पाया
इतनी ठोकरों के बाद आज मुझको होश आया
ज़िंदगी क्या है, काश कोई मुझको पहले समझाता
तो ज़िंदगी मैं मैं आज इतनी ठोकरे न खाता
बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तू , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझसे दूर कभी न जाता


है कई रंग जीवन मैं, बस तेरा ही एक रंग नहीं
तु संग तो है ज़िंदगी मेरे, पर मैं तेरे संग नहीं
काश मैं इन रंगों को आंचल पे तेरे सजा पता
तो ख़ुद की भी एक रंगीन दुनिया मैं बना पाता
बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तू , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझ से दूर कभी न जाता

- अजय कानोडिया

ek ghazal

ग़ज़ल

उनसे कह दो , वो जनाज़े पे मेरे नाआए
के उन्हें देख के, मेरे जीने केअरमाँ न फिर उभर आए

उधार की ज़िंदगी जीने से भी क्याफायदा
अच्छा हो जल्द ही क़र्ज़ ज़िंदगीका ये उतर जाए

चार दिन की ज़िंदगी बहुत मुख्तसरथी मेरी
अब अगर हम जाए भी तो र किधर जाए

आया हूँ मयकदे मे तेरे मैं मुद्दतों के बाद
मय ऐसी पिला मुझको की मुझ पर से नशा न उतर पाए

संभाले रहना अपने ज़ज्बातों को,जब हाले-दिल मैं कहूँ
देखो मोती ये तुम्हारी आँखों के ना बिखर जाए

मेरे दिल में मोहब्बत जरूरत से ज्यादा है शायद
ख़त्म होती ही नहीं, बांटता रहता हूँ मैं जिधर चाहे

बस बहुत हो चुका तमाशा मेरे दिल का बीचों-शहर
तमाशाइयों से कह दो, वे अपने घर जाए

उनसे कह दो , वो जनाज़े पे मेरे ना आए
के उन्हें देख के, मेरे जीने केअरमाँ न फिर उभर आए

- अजय कानोडिया