इस पाप की नगरी वालों ने, हमको क्या-क्या सिखलाया है
निर्बल के ऊपर हमने सदा, देखो जुल्मो का साया है
कुछ आदर्शों के फूल लिए चाहतें दुष्टों से टकराए
पर बात यह दुनियावालो जा कर कोई उनको बतलाए
कोशिश तो करनी है लेकिन हमने तो सदा यही पाया है
फूलों को देखा मुरझाते कांटा न कभी मुरझाया है
इस पाप की नगरी वालों ने, हमको क्या-क्या सिखलाया है
हर तरफ़ यहाँ पर भेद-भाव की उंच-नीच की है रेखा
मजहब के नाम पर लड़ते हुए लोगो को यहाँ हमने देखा
अब कौन उन्हें समझाए भला, हमने तो बहुत समझाया है
है नाम अलग पर इश्वर एक, वो रूप बदल कर आया है
इस पाप की नगरी वालों ने, हमको क्या-क्या सिखलाया है
-सादर
अजय कानोडिया
Saturday, December 8, 2007
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