बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तु , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझसे दूर कभी न जाता
ज़िंदगी माना, मैंने तुझसे वफ़ा कभी न की
शायद इसलिए हम दोनों आज भी है अजनबी
काश के मैं तुझ से कभी वफ़ा कर पाता
तो ज़िंदगी मैं तुझको आज अपना कह पता
बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तू , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझसे दूर कभी न जाता
ज़िंदगी क्या है, मैं यह समझ ही न पाया
इतनी ठोकरों के बाद आज मुझको होश आया
ज़िंदगी क्या है, काश कोई मुझको पहले समझाता
तो ज़िंदगी मैं मैं आज इतनी ठोकरे न खाता
बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तू , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझसे दूर कभी न जाता
है कई रंग जीवन मैं, बस तेरा ही एक रंग नहीं
तु संग तो है ज़िंदगी मेरे, पर मैं तेरे संग नहीं
काश मैं इन रंगों को आंचल पे तेरे सजा पता
तो ख़ुद की भी एक रंगीन दुनिया मैं बना पाता
बढ़ कर एक बार रोक लेती ऐ ज़िंदगी तू , तो मैं लौट आता
यूं भटके हुए क़दमों से तुझ से दूर कभी न जाता
- अजय कानोडिया
Tuesday, December 4, 2007
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