Tuesday, December 4, 2007

ek ghazal

ग़ज़ल

उनसे कह दो , वो जनाज़े पे मेरे नाआए
के उन्हें देख के, मेरे जीने केअरमाँ न फिर उभर आए

उधार की ज़िंदगी जीने से भी क्याफायदा
अच्छा हो जल्द ही क़र्ज़ ज़िंदगीका ये उतर जाए

चार दिन की ज़िंदगी बहुत मुख्तसरथी मेरी
अब अगर हम जाए भी तो र किधर जाए

आया हूँ मयकदे मे तेरे मैं मुद्दतों के बाद
मय ऐसी पिला मुझको की मुझ पर से नशा न उतर पाए

संभाले रहना अपने ज़ज्बातों को,जब हाले-दिल मैं कहूँ
देखो मोती ये तुम्हारी आँखों के ना बिखर जाए

मेरे दिल में मोहब्बत जरूरत से ज्यादा है शायद
ख़त्म होती ही नहीं, बांटता रहता हूँ मैं जिधर चाहे

बस बहुत हो चुका तमाशा मेरे दिल का बीचों-शहर
तमाशाइयों से कह दो, वे अपने घर जाए

उनसे कह दो , वो जनाज़े पे मेरे ना आए
के उन्हें देख के, मेरे जीने केअरमाँ न फिर उभर आए

- अजय कानोडिया

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