Tuesday, December 4, 2007

माँ बलि चाहती है

हमारे घर के सामने नित्य प्रति ,
कई बकरे बलि की वेदी पर चढाए जा रहे है
और बलि देने वाले, बलि देने से जरा भी नहीं घबरा रहे है

वे समझते है कि किसी कि बलि देने से, माँ प्रसन्न हो जायेगी
और उनके पाप कुछ घट जाएंगे
परन्तु वे यह नहीं सोचते कि किसी निर्दोष और असाहय की हत्या करने से
उनके पाप कितने बढ़ जाएंगे

लेकिन आजकल की दुनिया ही कुछ ऐसी है,
यहाँ लोहा लोहे को काटता है ,
हीरा हीरे को काटता है
और यहीं पर मानव पाप को पाप से काटने कि कोशिश कर रहा है
यद्यपि पाप हमेशा ही हारा है,
फिर भी मानव यह पाप करने से जरा भी नहीं डर रहा है

मैं यह नहीं कहता कि देवी माँ बलि नहीं चाहती
माँ बलि अवश्य चाहती है
लेकिन किसी निर्दोष और असहाय जीव की नहीं

माँ बलि चाहती है हिन्सा की
जो मनुष्य के रोम रोम में समाती जा रही है
माँ बलि चाहती है ईर्ष्या की
जो मनुष्य के प्रति मनुष्य में द्वेष भाव जगा रही है
माँ बलि चाहती है अधर्म की
जो धर्म को सर्वनाश के गर्क में डुबोती जा रही है
माँ बलि चाहती है, हमारे उन रस्मो रिवाज की
जो बलवान को तो कुछ नहीं कहते,
और बलहीन को भीतर ही भीतर खोकला बनाती जा रही है

केवल मैं ही नहीं, धरती, आकाश, पेड़ , पौधे, पशु, पक्षी
सभी चिल्ला चिल्ला कर यहीं कह रहे है

केवल मैं ही नहीं, धरती, आकाश, पेड़ , पौधे, पशु, पक्षी
सभी चिल्ला चिल्ला कर यहीं कह रहे है

माँ बलि चाहती है मनुष्य में छुपे उन सभी अव्गुनो की
जो मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने नहीं दे रहें है
जो मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने नहीं दे रहें है

-अजय कानोडिया

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